Article on Bhimsen Joshi : “विरासत की महिमा” (भाग 1)

एमपीसी न्यूज – ‘पंडित भीमसेन जोशी जन्मशताब्दी वर्ष’ या निमित्ताने विशेष लेख…


संस्कार भारती, पुणे महानगर द्वारा सहर्ष प्रस्तुत हैं कार्यक्रम “विरासत की महिमा”।

यह विरासत है संगीत की, स्वरों की, महिमा हैं किराना घराने के अध्वर्यू उस्ताद अब्दुल करिम खाँ साहिब की, सवाई गंधर्व की। महिमा हैं सवाई गंधर्व के शिष्य स्वरभास्कर अर्थात पंडित भीमसेन जोशी की, महिमा हैं उनके शिष्य तथा सवाई गंधर्व के पोते पंडित श्रीकांत देशपांडे की!

पंडित श्रीकांत देशपांडेजी ने किराना घराने से जो स्वरों की विरासत मिली उसे न केवल जतन किया बल्कि इन स्वरों से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध किया है। इसी विरासत की शृंखला से जुड़े हैं श्री. संजय गरुडजी, आपने पंडित श्रीकांत देशपांडे से संगीत की शिक्षा प्राप्त की है। विरासत की इस महिमा में किराना घराने की विशेषताओं के साथ साथ श्री.संजयजी अथक परिश्रम, लगन तथा प्रतिभा से इस श्रुंखला को और मजबूत करने का सफल प्रयास किया हैं।

फरवरी २०२१-२०२२, यह वर्ष ’पंडित भीमसेन जोशी जन्मशताब्दी वर्ष’ के रुप में मनाया जा रहा हैं। इस अवसर पर पंडित शिवदासजी देगलूरकर तथा श्री. संजयजी गरुड, आपका संकल्प श्रोताओं के साथ साझा करना चाहूँगी। पंडित भीमसेनजी की गायन शैली की विशेषताओं को समस्त श्रोताओं के सम्मुख प्रस्तुत करना आपका संकल्प हैं। इस संकल्प का पहला पड़ाव है “अष्टप्रहर”, इसके अंतर्गत प्रहर पर आधारित राग की प्रस्तुती होगी।

इस संकल्प पूर्ती के लिए संस्कार भारती परिवार की ओर से मैं विनिता देशपांडे आपको हार्दिक शुभकामनाएं देती हूँ।

पंडित भीसेनजी का जन्म ४ फरवरी १९२२ को कर्नाटक के धारवाड जिले के रोण गाँव में हुआ। इनके पिता का नाम गुरुराज तथा माता का नाम रमाबाई है। बचपन से ही भीमसेनजी संगीत में रुची रखते थे। अपनी माँ के साथ कानडी भजन गाया करते थे। ग्यारह वर्ष की आयु में अपना घर छोड़ कर संगीत की खोज में निकल पड़े। ग्वाल्हियर, लखनऊ, रामपूर जैसे जगह जगह जा कर दिग्गजों का संगीत सुनते रहे, सूर-ताल-लय को अपने आप में समेटते रहें। इसी यात्रा में उनके पिता ने उन्हें खोज निकाला, भीमसेनजी की संगीत की लगन देख कर उन्हें श्री रामभाऊ कुंदघोलकर के यहाँ शिक्षा के लिए भेज दिया। श्री रामभाऊ कुंदघोलकर जिन्हें हम सब “सवाई गंधर्व” के नाम से जानते हैं। सवाई गंधर्व उस समय के श्रेष्ठ गव्वैये थे। आज जिस आवाज की दुनिया प्रशंसा करते नहीं थकती, जिनके सूरों की गूंज आज भी कानों में गूंजती हैं, उन्हीं भीमसेनजी की आवाज को तैयार किया सवाई गंधर्व ने। उन्ही की तालिम में भीमसेनजी की आवाज और सूर निखरे… भीमसेनजी की तपस्या और साधना रंग लाई। निरंतर अभ्यास से उनकी आवाज इतनी तैयार हुई की मानो मंदिर के गर्भगृह की गूँज, गहराई, उनकी आवाज में उतर गई हो। यहीं कारण हैं कि भीमसेनजी के सूर अमर हैं और हमेशा अमर रहेंगे।

श्री संजय गरुडजी, विरासत की महिमा की इस शृंखला “अष्टप्रहर” में प्रातः प्रहर का राग प्रस्तुत करेंगे। प्रातः प्रहर का राग अर्थात राग भैरव!

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स्वयम भगवान शिव इस राग के रचयिता माने जाते है। इस राग को भैरव थाट का जनक राग कहा जाता है। इस राग में आरोह में सात स्वर तथा अवरोह में सात स्वरों का प्रयोग किया जाता हैं, इसलिए इसे स्म्पूर्ण जाति का राग कहा जाता है। इस राग का वादी स्वर धैवत “ध” है, संवादी स्वर ऋषभ अर्थात रे है। इस राग का गायन समय प्रातःकाल है। इस राग की प्रकृति शांत, करुण और गंभीर है। इस राग में ख्याल, धृपद, तराना गाए और बजाए जाते हैं।

आईए अब सुनते हैं स्वरभास्कर पंडित भीमसेन जोशी को समर्पित स्वरमाला का पहला स्वरपुष्प!

श्री संजय गरुडजी की आवाज में राग- भैरव .

संजयजी, आपके गुरु पंडित श्रीकांत देशपांडेजी भीमसेनजी के शिष्य थे।आपने उनकी गायकी का अध्ययन भी किया हैं। आपके पास तो उनकी कई स्मृतियाँ भी होंगी । इस कार्यक्रम की अगली कडी में अगले प्रहर के राग के साथ इस पर अवश्य चर्चा करेंगे।

श्रोताओं! “विरासत की महिमा” इस कार्यक्रम की संकल्पना पंडित शिवदास देगलूरकरजी की हैं।

इस कार्यक्रम के माध्यम से श्री. संजय गरुडजी पंडितों की गायकी का झंडा ले कर समस्त भारतवर्ष में भ्रमण करने वाले हैं। समस्त विश्व में स्वरभास्कर, भारतरत्न पंडित भीमसेन जोशीजी की बुलंद आवाज पहूँचाने का हमारा यह प्रयास हैं। यह प्रयास श्रोता, आयोजक, प्रायोजक के सहायता के बिना अधुरा है। आपकी सहायता और विश्वास से ही यह प्रयास सफल होगा। हमें विश्वास हैं कि आप सभी हमारा साथ अवश्य देंगे।

धन्यवाद
॥सर्वेषां मंगलम भवतु॥

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